नई दिल्ली, जून 8 -- भले ही दुनिया भर में संचार क्रांति का असर पड़ रहा हो, मगर आभासी और वास्तविक स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर होता है। यदि ऐसा न होता, तो विगत 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित किए गए प्रदर्शन में पर्याप्त भीड़ जुटती और आंदोलन का बड़ा स्वरूप सरकार को गंभीर निर्णय लेने के लिए विवश करता। निश्चय ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, किंतु जन-साधारण को भ्रमित करने की अनुमति नहीं देता है। वस्तुस्थिति यह है कि इस धरने-प्रदर्शन का फ्लॉप होना यह बताता है कि इस मिशन का समर्थन करने वाले निराश व हताश राजनीतिक दलों के मनसूबे सफल नहीं हो सकते। विदेशी धरती से भारत की व्यवस्था को ध्वस्त करने के प्रयासों को यहां की अधिसंख्य जनता स्वीकार नहीं करती, भले ही अराजक शक्तियां कितने ही मुखौटे बदल...