नई दिल्ली, मार्च 19 -- गौरैया, वह छोटी सी चिड़िया जो कभी हमारी छतों, आंगनों और खेतों की सच्ची सखी थी, आज लुप्त होने के कगार पर खड़ी है। 20 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व गौरैया दिवस हमें इस छोटे से जीव के प्रति हमारी उदासीनता का आईना दिखाता है। यह मात्र एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियों का जीवंत प्रतीक है। आज जब हम आधुनिकता की चकाचौंध में डूबे हैं, गौरैया की कमी हमें भावनात्मक शून्यता का एहसास कराती है। गौरैया का साहित्यिक चित्रण भारतीय साहित्य में इतना गहरा है कि वह कविता, कहानी और लोकगीतों की आत्मा बन गई है। हिंदी साहित्य के महाकवि सूरदास ने अपनी पदावलियों में गौरैया को कृष्ण की लीलाओं का साक्षी बनाया है। 'गौरैया चुके ना कान्हा के गुन' जैसी पंक्तियां हमें याद दिलाती हैं कि कैसे यह चिड़िया भगवान के प्रेम में लीन होकर चहचहाती थी। कबीरद...