गोरखपुर, मई 22 -- गोरखपुर। प्रमुख संवाददाता करीब 2600 वर्ष पहले कुशीनगर की पावन धरती पर भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। बौद्ध परंपरा में इसे मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष की सर्वोच्च अवस्था स्वीकारा जाता है। तभी से भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष श्रद्धा, करुणा और शांति के प्रतीक बनकर दुनिया भर के लोगों को उनके धम्म और मानवीय संदेश की याद दिलाते आ रहे हैं। आज भी करोड़ों श्रद्धालु इन अवशेषों को आध्यात्मिक प्रेरणा और आस्था के केंद्र के रूप में देखते हैं।

धातुओं का प्रदर्शन इसी विरासत की अनूठी झलक हाल ही में लद्दाख में देखने को मिली, जहां 1 से 14 मई तक भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा (सिद्धार्थनगर) में मिले धातुओं को आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए प्रदर्शित किया। लेह और ज़ंस्कार में आयोजित इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी में 1.18 लाख ...