बागपत, अगस्त 5 -- बागपत। श्रावण मास में कांवड़ यात्रा की शुरुआत त्रेता युग में लंकाधिपति रावण ने की थी। भगवान शिव के परम भक्त रावण के बाद इस यात्रा को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी किया था। कांवड़ बांस से बनी होती हैं। इसे बहंगी कहा जाता है। आधुनिकता के दौड़ में कांवड़ का स्वरूप भी बदल चुका है। अब ज्यादातर शिवभक्त डांक कांवड़ में सिर्फ गंगाजल लेकर दौड़ते है। ज्योतिषाचार्य पंड़ित गौरीशंकर शर्मा ने बताया कि कांवड़ का इतिहास त्रेता युग से हुआ था। तब भगवान शिव के परम भक्त लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रशन्न करने के लिए कांवड़ उठाई थी। तब कांवड़ को बहंगी कहा जाता था। रावण के बाद भगवान राम भी कांवड़ लाए थे। उन्होंने बताया कि आधुनिकता के दौड़ में कांवड़ लाने का अंदाज भी बदल गया है। डाक कांवड़ यात्रा आम कांवड़ यात्रा से थोड़ी अलग होती है। कांवड़िया अक्सर का...