फतेहपुर, अगस्त 6 -- फतेहपुर। कभी जिसकी खट-खट की आवाज से दोआबा के गांवों की सुबह होती थी और जिनके बुने कपड़ों की गूंज गुजरात से लेकर बंगाल तक सुनाई देती थी, आज वही करघे पूरी तरह खामोश हो चुके हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़, घटती मांग और काम के वाजिब दाम न मिलने से सदियों पुरानी हथकरघा विरासत अब अंतिम सांसें ले रही है। आलम यह है कि बुजुर्ग कारीगरों के कांपते हाथों से हुनर छूट रहा है और पेट पालने की मजबूरी में नई पीढ़ी इस पारंपरिक काम से किनारा कर चुकी है। पेश है आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' की विशेष रिपोर्ट... समाप्त हो चुकी हथकरघा की दरी यह भी पढ़ें- Lalitpur News: जनपद में खोलें हथकरघा ऑफिस, क्रय करें साड़ियां दूर हो जाएगी कारीगरों की बदहाली, आएगी सम्पन्नताहथकरघा की वस्त्रों की मांग कभी दोआबा के गांधी ग्राम सेवा संस्थान में तैयार होने वाली दर...