नई दिल्ली, सितम्बर 6 -- साल 2004 की बात है। दिल्ली के एक सरकारी स्कूल के क्लासरूम में 19-20 साल की एक लड़की ने कदम रखा। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वह बेंच पर बैठने नहीं, बल्कि ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ी होकर बच्चों को पढ़ाने आई थी। जेब खाली थी और कॉलेज की फीस भरनी थी। इसी मजबूरी में उसने महज 60 रुपये रोज की दिहाड़ी पर पढ़ाना शुरू किया। महीने का बमुश्किल 1200 से 1300 रुपये हाथ आता था। आज उसी लड़की की लगन और जज्बे को पूरे देश में पहचान मिली है। हम बात कर रहे हैं 41 साल की सुमन गोयल की, जिन्हें नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026 के लिए चुना गया है। रोहिणी के पूठ कलां स्थित राजकीय सर्वोदय कन्या विद्यालय में प्राइमरी टीचर के तौर पर तैनात सुमन की यह कहानी सिर्फ एक पुरस्कार तक सीमित नहीं है। यह कहानी उस हिम्मत की है, जो अभावों के बीच रास्ता बनाती है और सै...