पूर्णिया, फरवरी 1 -- बैसा, एक संवाददाता। प्रखण्ड क्षेत्र के अनगढ़ हाट की धरती पर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन साध्वी मेरुदेवा भारती ने रुक्मिणी-कृष्ण विवाह प्रसंग में बेटी की विदाई का मार्मिक वर्णन सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित अनेक श्रद्धालु भावुक होकर अश्रुपूरित हो उठे। रुक्मिणी की विदाई का दृश्य सुनाते समय कथा व्यास का स्वर स्वयं भर्रा गया। उन्होंने कहा कि बेटी पराया धन नहीं, बल्कि माता-पिता की आंखों का नूर होती है। जब वह विदा होती है, तो केवल घर नहीं छोड़ती, माता-पिता का हृदय भी साथ ले जाती है। भारतीय संस्कृति में बेटी की विदाई केवल एक सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि संस्कारों से भरा गहन भावनात्मक अनुष्ठान है। यह परंपरा माता-पिता, परिवार और समाज तीनों के भीतर उत्तरदायित्व, करुणा और त्याग क...