शाहजहांपुर, दिसम्बर 21 -- पूस की कड़ाके की ठंड, घना कोहरा और बर्फीली हवाओं के बीच किसानों की जिंदगी किसी युद्ध से कम नहीं रह गई है। खुले आसमान के नीचे, दांत किटकिटाती सर्दी में आग के सहारे बैठकर किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। सिर पर बंधे कंबल, ओढ़ी रजाई, हाथ में टार्च और लाठी लेकर बेसहारा पशुओं से फसलों की रक्षा करना आज किसान की नियति बन चुकी है। जरा सी चूक होते ही बेसहारा पशुओं के झुंड फसलों को चट करने में देर नहीं लगाते। दिन-रात अलग-अलग परिवारों के सदस्य खेतों में पहरा देते हैं, फिर भी मेहनत पर पानी फिरने का डर हर पल बना रहता है। यह कितना कठिन और दुष्कर काम है, इसे वही किसान समझ सकता है जो शीतलहर के बीच परिवार का पेट पालने की जद्दोजहद में लगा है। विडंबना यह है कि एक ओर सरकारी मशीनरी सड़कों और खेतों में बेसहारा पशुओं क...
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