नई दिल्ली, जून 17 -- हरबंश दीक्षित, विधि विशेषज्ञ भारतीय न्यायिक इतिहास में ऐसा विरले ही हुआ कि कोई उच्च न्यायालय अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय की कार्य-प्रणाली या उसके कारण पैदा हुई स्थिति पर अप्रसन्नता व्यक्त करे। हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा 'अप्पावु बनाम आईएस इंबादुरई' मामले में दिए गए फैसले ने इस असामान्य स्थिति को जन्म दिया है। मद्रास उच्च न्यायालय ने न केवल साल 2016 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम को लगभग दस वर्ष बाद पलटते हुए द्रमुक प्रत्याशी एम अप्पावु को राधापुरम विधानसभा क्षेत्र का वास्तविक विजेता घोषित किया, बल्कि इस पूरे मामले के निस्तारण में हुई देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यायालय की टिप्पणी केवल इसी मुकदमे तक सीमित नहीं है; इसने भारतीय लोकतंत्र और न्यायिक-व्यवस्था के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है-...