देवघर, सितम्बर 27 -- देवघर, प्रतिनिधि। पूर्वजों का स्मरण, संस्कारों का संरक्षण और भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी को यदि हम एक साथ देखना चाहें तो पितृपक्ष में देख सकते हैं। यह भी पढ़ें- कपिलमुनि के पानी देने के साथ ही पितृपक्ष शुरूभारतीय संस्कृति की पहचान भारतीय संस्कृति की पहचान केवल उसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि उसकी स्मृति, निरंतरता और कृतज्ञता की चेतना में निहित है। संसार की अनेक सभ्यताओं ने अपने अतीत को इतिहास के पन्नों में सुरक्षित रखा, किंतु भारतीय मनीषा ने अतीत को जीवन का हिस्सा बनाया। यहां पूर्वज केवल इतिहास का विषय नहीं हैं, वे हमारी चेतना, संस्कार और जीवन-दृष्टि के आधार हैं। इसी महान सांस्कृतिक दृष्टि की अनुपम अभिव्यक्ति है पितृपक्ष। यह भी पढ़ें- पूर्वजों का श्राद्ध नहीं करना पड़ सकता है भारी, गरुड़ पुराण में बताए गए हैं ये प...