उनके लिए मठ हमारे लिए डंडे
नई दिल्ली, जुलाई 25 -- सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार अब तक राजनीति में ही 'बचाओ-बचाओ' की गुहार लगती थी, अब लेखकों से कहा जा रहा है कि बचाओ-बचाओ, संविधान बचाओ, जनतंत्र बचाओ, आजादी बचाओ... हमें बचाओ। लेखकों को हमेशा विरोध की राजनीति करने को कहा जाता था। लेखक का काम हमेशा सत्ता के विरोध में रहना बताया जाता था, विरोध की कविता-कहानी करना बताया जाता था, सत्ता से सवाल करने वाली रचना करने और सवाल में भी कठिन सवाल पूछने को कहा जाता था। एक दौर ऐसा भी रहा, जब लेखक दूसरे से पूछते रहते थे कि 'साथी तुम्हारी राजनीति क्या है?' या कि 'तय करो किस ओर हो तुम'? बहुत से लेखक ऐसे सवाल सुनकर झटका खा जाते और सोचने लगते कि यह पूछ क्या रहा है? यह कैसा सवाल है, जो साहित्यकार से किया जा रहा है? जैसे ही कोई जवाब में कहता कि मैं तो अ-राजनीतिक हूं, साहित्य का राजनीति से...
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