नई दिल्ली, मार्च 20 -- ममता कालिया को साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए बधाई देते हुए उस विवाद पर बात करना चाहूंगा, जो जबरन खड़ा किया जा रहा है। विवाद ममता जी द्वारा अपने एक अनुभव के बारे में है, जहां वह अपने पति रवींद्र कालिया के साथ जैदी साहब के घर दावत पर जाती हैं। यह प्रसंग उसी जीते जी इलाहाबाद किताब में दर्ज है, जिस पर ममता कालिया को यह पुरस्कार मिला है। इस किताब में वह लिखती हैं- जहां एक तरफ मेजबानी है, अपनापन है, तो दूसरी तरफ खुद उनके भीतर बैठा एक छोटा-सा संस्कार/ संकोच (मंगलवार को मांस न खाना)। यहां कोई धर्म विशेष की श्रेष्ठता नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव की झिझक और सामाजिक दबाव का चित्रण है। जो लोग इस पर आपत्ति कर रहे हैं, वे जान-बूझकर बात को मोड़ रहे हैं। लेखिका खुद मानती हैं कि वह कोई व्रत नहीं रखतीं, फिर भी मन में एक 'हिचक' बैठी हु...