चंदौली, जून 18 -- चंदौली, संवाददाता। इमाम हुसैन का जिक्र और मजलिसों का मकसद इस्लाम की सही तस्वीर दुनियां के सामने पेश करने की कोशिश है। करबला की जंग इस्लामिक सिद्धांतों के लिए थी। इसमें इमाम हुसैन को जीत मिली। यजीद का नाम मिट गया। जबकि हुसैन आज भी हर दिल में जिंदा है। यह बातें मुहर्रम के दूसरे दिन गुरुवार को नगर स्थित स्वर्गीय डॉ. बबुआ के अजाखानाए-ए-रजा में मजलिस में मौलाना जाफर रिज्वी ने तकरीर पेश करते हुए कही। वहीं दुल्हीपुर से आई अंजुमन यादगारे हुसैनी ने अपना कदीमी मातम पेश कर इमाम हुसैन को खिराजे अकीदत पेश किया। मायल चंदौलवी, वकार सुल्तानपुरी, शहंशाह मिर्जापुरी समेत अलग-अलग शाायरों और पेशख्वानों ने करबला की दास्तां पेश किए। यह भी पढ़ें- मुहर्रम केवल शोक का महीना नहीं बल्कि मानवता की देता है सीखइमाम हुसैन की कुर्बानी इस दौरान मौलाना जा...