आभासी दुनिया में टूट रहे आधुनिक परिवार
नई दिल्ली, अगस्त 9 -- सभ्यता को सबसे गहरा घाव किसी युद्ध, महामारी या आर्थिक संकट ने नहीं, उस चमकती स्क्रीन ने दिया है, जिसे हमने सुविधा समझकर जीवन का केंद्र बना लिया। इतिहास में पहली बार संवाद के साधन सबसे अधिक हैं, पर संवाद सबसे कम है। आवाजें हैं, पर अहमियत नहीं। हर चेहरा ऑनलाइन है, हर मन ऑफलाइन हो रहा है। यही हमारे समय का सबसे मौन, व्यापक और सबसे कम समझा गया सामाजिक पतन है। परिवारों का विघटन अब खामोशी से हो रहा है। घर दीवारों से नहीं, स्क्रीन से संचालित हैं। एक ही छत के नीचे लोग अलग-अलग डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं। भारत में एक व्यक्ति प्रतिदिन औसतन सात घंटे से अधिक वक्त स्क्रीन पर बिताता है। माता-पिता पांच घंटे से अधिक और बच्चे चार घंटे से ज्सादा यमय स्मार्टफोन को देते हैं। अध्ययनों में दो-तिहाई माता-पिता और आधे से अधिक बच्चों ने माना ...
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