आधुनिक समाज में मर रही संवेदना
नई दिल्ली, अगस्त 17 -- माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश में जिंदगी का हर दुख भूल जाते हैं। उनकी आंखों में बस एक सपना होता है कि बच्चे बड़े होकर सफल हों और जीवन की ढलती शाम में उनका सहारा बनें। इसी उम्मीद को लेकर वे अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़कर बच्चों के भविष्य के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। ऐसे में, जब वही संतान बुढ़ापे में उनका हाथ थामने के बजाय उनसे दूर हो जाए, तब उस अकेलेपन का दर्द कितना गहरा होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। हाल ही में सोनीपत के एक व्यक्ति का मामला रिश्तों की बदलती तस्वीर पर सोचने को मजबूर करता है। कभी मुंबई के बड़े कपड़ा व्यापारियों में शुमार रहे व्यक्ति पिछले तीन वर्षों से सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे। उनकी तीन बेटियां हैं। उन्होंने बेटियों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और जीवन में आगे बढ़ने ...
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