गंगापार, अप्रैल 28 -- कौंधियारा/करछना, हिसं। करछना क्षेत्र में इन दिनों वैवाहिक कार्यक्रमों की धूम तो है, लेकिन बदलते समय के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों का स्वरूप तेजी से सिमटता नजर आ रहा है। जहां पहले शादियां सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण होती थीं, वहीं अब आधुनिकता की चकाचौंध ने उन्हें काफी हद तक प्रभावित कर दिया है। डीजे, लाइट और फिल्मी गीतों के बीच गारी, बन्नी-बन्ना, सोहाग और विवाह गीत जैसे पारंपरिक लोकगीत अब सुनाई नहीं देते।पूर्व में बारातों में जनवास, द्वारचार, नेग-नेहछू, पंडितों के शास्त्रार्थ और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की विशेष परंपरा थी, जिसमें बाराती देर तक रुककर आनंद लेते थे। सुबह सामूहिक विदाई का अलग ही महत्व होता था। यह भी पढ़ें- श्मशान घाट पर शादी; उत्तराखंड में डेस्टिनेशन वेडिंग के नाम पर पर्यटकों की हरकत से बव...