लातेहार, अक्टूबर 3 -- बेतला प्रतिनिधि । बदलते जीवन-शैली और आधुनिकता की चकाचौंध के प्रभाव से दुर्गापूजा की पांवलगी जैसी कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त होने लगी है। जबकि सदियों पुरानी पांवलगी की परंपरा दुर्गापूजा का अटूट हिस्सा रहा है। यहां बता दें कि कुछ वर्ष पूर्व जब समाज आधुनिकता के प्रभाव से मुक्त था तब मॉं दुर्गे की प्रतिमाओं का विसर्जन करने के बाद घर लौटने के उपरांत गांव के लोग घर-घर जाकर अपने बड़े-बुजुर्गों का चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेते थे। बदले में घर के बरामदे या द्वार पर बैठे बुजुर्ग उन्हें मिठाई या पकवान खिलाकर दीर्घायु होने का आशीर्वाद देते थे। सनातन की यही मंगलकारी और शुभ परंपरा पांवलगी कहलाती थी। इसका मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को शिष्टाचार से जोड़े रखना और सामूहिकता को बढ़ावा देते सामाजिक समरसता को मजबूती प्रदान करना थ...