लखीसराय, फरवरी 26 -- लखीसराय, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। फागुन का महीना शुरू होते ही कभी गांव की गलियां पारंपरागत होली गीत और जोगीरा की गूंज से चहक हो उठता था। मगर बदलते समय के साथ सांस्कृतिक रंग अब धीरे-धीरे फीका पड़ता जा रहा है। पहले शहर में आधुनिकता के कारण परंपरागत होली का स्वर कम हुआ। अब गांव में भी बदलाव साफ नजर आने लगा है। मगही और भोजपुरी लोकधुन पर आधारित जोगीरा, फगुआ और पारंपरिक होली गीत की जगह अब तेज आवाज वाले डीजे और कई बार अश्लील गीत ने ले लिया है। जिससे होली का पारिवारिक व सामुदायिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है। हरि शंकर पांडे, पंजाबी कुमार, गोहल महंत एवं दिनेश महंत की माने तो पहले फागुन के पहले दिन से ही गांव में होली का उत्साह शुरू हो जाता था। शाम होते ही गांव के सार्वजनिक स्थल, बथान, चौपाल और मंदिर परिसर में मंडली जुटकर देर रात तक...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.