नई दिल्ली, मई 2 -- छप्परफाड़ मतदान सिर्फ हार या जीत की मुनादी नहीं करते, वे समय की चाल और उससे उपजी सामाजिक सोच का भी आईना होते हैं। सोमवार को जिन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम जग-जाहिर होने हैं, उनकी आरंभिक अनुगूंज कैसी थी? चुनाव प्रचार के उन मैराथन दिनों में हमारे चारों ओर नफरतों के तीर चल रहे थे? कहीं मियां, कहीं घुसपैठिया, कहीं हिंदी, कहीं हिंदू, कहीं मुसलमान, तो कहीं सनातन का जाप हो रहा था। सवाल उठता है, पांच से पंद्रह साल की हुकूमत के बाद चुनावी रण में उतरे मुख्यमंत्रियों और उनके विरोधियों के पास क्या कोई सार्थक तथ्य कहने को नहीं था? यकीनन, उनके पास बहुत कुछ है, फिर वे ऐसा क्यों करते हैं? इस सवाल का जवाब देने से पहले मैं आपके सामने कुछ आंकड़े पेश करना चाहूंगा। सबसे पहले साक्षरता की बात। सन् 1952 में हुए पहले आम चुनाव के दौरान भारत की स...