कृष्णजी शुक्ल, जुलाई 6 -- कृष्णजी शुक्ल, अधिवक्ता- केंद्र सरकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अमरोहा की जिस प्राथमिकी (F.I.R.) को रद्द करने से इनकार किया है, वह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें धार्मिक रीति-रिवाज़ों की आड़ में एक नाबालिग लड़की का बार-बार यौन शोषण होता रहा। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने जो टिप्पणी की, वह साफ है- पर्सनल लॉ की आड़ लेकर किसी अपराध से बचा नहीं जा सकता। कोर्ट की यह टिप्पणी संक्षिप्त जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक लंबी कानूनी और सामाजिक बहस छिपी है, जो सीधे तौर पर संविधान और पर्सनल लॉ से जुड़ी है। सबसे पहले दर्ज प्राथमिकी के अनुसार घटनाक्रम को समझते हैं। पीड़िता का निकाह महज 15 वर्ष की आयु में कराया गया। शादी के बाद मारपीट...