मऊ, मार्च 3 -- मऊ, संवाददाता। वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित बहुत सारी पुरानी परंपराएं बदली हैं तो होली का पर्व भी अछूता न रहा। अब होली में टेसू, पलाश और हरसिंगार के फूल से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग नही होता है। प्राकृतिक रंगों का स्थान त्वचा के प्रति बेहद असुरक्षित रासायनिक रंगों ने ले लिया है। होली का अंदाज बदला है। जंगल कट गए और संरक्षण की कोशिश नहीं हुई। अब पलाश उड़न छू हो गए। सेमल और टेसू भी गायब हो गए। हरसिंगार भी बस चंद शौकीनों की वाटिका तक सिमट गया है। एक जमाना था जब जिले में बनअवध क्षेत्र से लेकर वन देवी तक और देवारा से लेकर रानीपुर के ऊसर तक जंगलों में पलाश और टेसू की बहुलता रही। वर्ष 1960 तक इस जिले से पलाश के पत्ते और पुष्प अन्य स्थानों को भेजे जाते रहे। पलाश पर मुसहर वर्ग की आजीविका टिकी थी। वर्ष पर्यंत इसके पत्तों से पत्तल ब...
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