नई दिल्ली, सितम्बर 30 -- पंकज चतुर्वेदी,वरिष्ठ पत्रकार हर साल 1 अक्तूबर को 'अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस' के अवसर पर गोष्ठियां आयोजित होती हैं, वक्तव्य दिए जाते हैं और बुजुर्गों को समाज के लिए अमूल्य बताने वाले नारों की बौछार कर दी जाती है, पर इन औपचारिक आयोजनों के आवरण को हटाकर देखें, तो भारत की कड़वी सामाजिक सच्चाई अत्यंत दुखद और विचारणीय दिखती है। जिस संस्कृति में बुजुर्गों के अनुभवों को जीवन की राह दिखाने वाला प्रकाशपुंज माना जाता रहा है, उसी समाज में उन्हें अनुयोगी सामान समझकर घर के किसी कोने में फेंक देने या वृद्धाश्रमों के सहारे छोड़ देने की आदत गहराती जा रही है। एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि बनारस के एक मशहूर वृद्धाश्रम में बीते एक वर्ष के दौरान पचास से अधिक बुजुर्गों की सांसें थम गईं। जब वे जीवित थे, तब उनके परिजनों ने कभी उन...