नई दिल्ली, जुलाई 14 -- मनुष्य का असली रूप आनंद भरा है। आनंदमग्न रहना ही उसका प्रधान गुण है। दुख के हटते और मिटते ही वह मूल स्वरूप में पहुंच जाता है। मनुष्य भी स्वर्ग के देवताओं की तरह आनंदित रह सकता है, यदि उसके कष्ट के कारणों का समाधान हो जाए। अज्ञानता अर्थात नासमझी- इसके कारण ही व्यक्ति उलटा-पुलटा सोचता है। जो नहीं सोचना चाहिए, वह सोचता है और उलझनों में फंसकर हैरान, परेशान व दुखी रहता है। अपनी शक्ति व क्षमता का सही ज्ञान न होने के कारण ऐसे असंभव काम हाथ में लेता है, जिनमें असफलता और निराशा ही हाथ लगती है। दूसरे व्यक्ति व परिवेश की सच्चाइयों की सही जानकारी न होने के कारण झूठी आशा-अपेक्षा और कल्पनाओं में जीता है, अंततः खिन्नता और निराशा में घुटता हुआ दुखी रहता है। अपनी नासमझी के कारण ही क्षणिक सुख व लाभ के चक्कर में ऐसे काम कर बैठता है कि...