अपनी यादों के उजाले हमारे साथ छोड़ गए बशीर बद्र
नई दिल्ली, मई 28 -- शीन काफ निजाम,मशहूर शायर अभी दो दिन पहले ही उनके शहर भोपाल से लौटा हूं। वहां भी दोस्तों से दरयाफ्त किया कि बशीर बद्र साहब का अब क्या हाल है? पिछले दिनों जब उनसे मिलने गया था, तब वह पहचान नहीं पा रहे थे और बोलना भी उनके लिए दुश्वार था। अफसोसनाक था कि उनकी हालत रोज-ब-रोज बद से बदतर होती जा रही थी। यादों से जुड़ी बीमारी ही ऐसी थी कि जिसका कोई इलाज न था। दोस्तों से सिर्फ यही खबर मिलती रहती थी कि बशीर साहब का अब-तब का ही मामला है। और आखिरकार उनके न रहने की मनहूस खबर भी आ ही गई। मेरे उनसे बड़े अच्छे ताल्लुकात रहे। सन् 1973-74 से ही हमारा साथ था। दरअसल, उस समय मैंने अपने जोधपुर में एक मुशायरा कराया था- 'अदब का बदलता हुआ मंजरनामा'। मैंने उनसे कहा कि आप जरूर तशरीफ लाइए। गौर कीजिएगा, वह तब भी मुशायरे में आने के लिए मुआवजे को लेक...
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