मुंगेर, मार्च 2 -- दुर्गेश सिंह, हवेली खड़गपुर। सद्भाव और भाईचारे को अनेक चटकीले रंगों में समाहित कर मनाया जाने वाला उत्सव होली में पारंपरिक खुशबुओं की झलक अब नहीं दिखती। बदलते दौर के साथ होली की परंपरागत क्रियाएं, प्राकृतिक रंग, पिचकारियां, पकवान, होली गीत आदि पर पाश्चात्य सभ्यता का असर दिखता है। जाति, धर्म, संप्रदाय को भूलकर मनाया जाने वाला यह उत्सव कभी समूहिक रूप से मनाया जाता था लेकिन बदलते समय के साथ अब होली के त्योहार में लोक परंपरा और उससे जुड़े पहलू प्रभावित हो रहा है। पहले फागुन के आते ही लोगों में मस्ती के सुर छाने लगते थे। गांव के चौपाल और चौराहों पर फाग और होली के पारंपरिक गीतों से मन खिल उठता था। महीने भर पूर्व से पारंपरिक होली, फाग गीत और जोगीरा गायन से गांव में होली की झलक दिखना शुरू हो जाती थी। होली के आंचलिक गीत, राम और कृ...
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