नई दिल्ली, अक्टूबर 14 -- "दुर्भाग्यवश मैं हिंदू अछूत के रूप में जन्मा, यह मेरे हाथ में नहीं था। लेकिन मैं यह घोषणा करता हूं कि मैं नीच और अपमानजनक स्थिति में जीना स्वीकार नहीं करूंगा। मैं आपको यह दृढ़ आश्वासन देता हूं कि मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।"- ये शब्द डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने 13 अक्टूबर 1935 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के येवला में आयोजित सम्मेलन में कहे थे। इस घोषणा ने न केवल हिंदू समाज के भीतर हलचल मचा दी, बल्कि भारत के सामाजिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ स्थापित किया। हालांकि उन्होंने यह ऐलान 1935 में किया, लेकिन अंतिम निर्णय तक पहुंचने में उन्हें दो दशक से अधिक समय लगा। इस अवधि में उन्होंने जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया, दलित अधिकारों की वकालत की और विभिन्न धर्मों का गहन अध्ययन किया। अंततः उन्हें समता और करुणा के ...