आचार्य तुलसी, जून 9 -- पौराणिक कथाओं और साहित्य में हंस को 'नीर क्षीर विवेकी' कहा गया है। यानी अगर पानी और दूध को मिला दिया जाए, तो उसमें से वह केवल दूध ग्रहण करता है। इस प्रकार हमें भी अच्छे-बुरे के सागर से केवल अच्छाई ग्रहण करनी चाहिए। मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह अपनी हंस-मनीषा जाग्रत करे। अच्छाई और बुराई दोनों की सत्ता हर युग में किसी-न-किसी रूप में रहती ही है। हां, किसी युग में बुराई का पलड़ा भारी होता है, तो किसी युग में अच्छाई का। जब-जब बुराई का पलड़ा भारी होता है, तब-तब संसार मे दुख, दैन्य और विपत्तियों का नृशंस आक्रमण होता है। आज संसार की क्या स्थिति है, यह आपसे छिपी नही है। हिंसा का तांडव हो रहा है। झूठ, कपट, चोरी, दुराचार का साम्राज्य छाया हुआ है। यह इस बात की सूचना है कि बुराई का पलड़ा भारी हो रहा है और अच्छाई का प...