सिद्धार्थ, अगस्त 14 -- डुमरियागंज, हिन्दुस्तान संवाद। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हंसते-हंसते जान न्योछावर करने वाले अमर शहीदों को अब तक एक अदद स्मारक भी नसीब नहीं हो सका है। इतना ही नही फिरंगियों ने शहीदों को पिंडारी बताकर उनकी लाशों को अमरगढ़ ताल में फेंक दिया था। शहीदों के माथे पर लगाया गया कलंक आज भी कायम है। शहीद स्थल पर बने शहीद स्मारक गेट को छोड़ दिया जाए तो आज भी इन शहीदों की शहादत उपेक्षित है。 यह भी पढ़ें- अंग्रेजों के खिलाफ जंग में धमदाहा के शूरवीरों ने लिखी थी वीरता की गाथाअमरगढ़ के क्रांतिकारी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की क्रांति की आग जब देश में शांत होने लगी थी तो उसी वक्त अमरगढ़ के क्रांतिकारियों ने देश को आजाद करने की एक नई ज्योति जलाई थी। क्रांतिकारियों के दल ने उस समय जंगल में रुके फिरंगियों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। ...