रांची , मई 21 -- झारखंड के राज्यपाल सह राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार ने आज उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग, झारखण्ड सरकार द्वारा चाणक्य बीएनआर होटल, राँची में आयोजित दो दिवसीय कुलपति सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर कहा कि यह सम्मेलन झारखण्ड की उच्च शिक्षा को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर है।
श्री गंगवार ने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की चेतना एवं राष्ट्र की प्रगति का आधार है। विश्वविद्यालय विचार, ज्ञान, अनुशासन, शोध और चरित्र निर्माण के केंद्र होते हैं तथा किसी भी राज्य का भविष्य उसके शिक्षण संस्थानों में ही आकार लेता है।
श्री गंगवार ने कहा कि झारखण्ड में स्कूली शिक्षा की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, किंतु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अभी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है तथा उच्च शिक्षा में ड्रॉपआउट की समस्या भी गंभीर है। गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक वातावरण, समयबद्ध परीक्षाओं एवं रोजगारोन्मुखी शिक्षा के अभाव में बड़ी संख्या में विद्यार्थी राज्य से बाहर जाने को विवश होते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय है।
श्री गंगवार ने ने कहा कि अब समय केवल समस्याओं की चर्चा करने का नहीं, बल्कि समाधान और परिणाम के साथ आगे बढ़ने का है। आउटकम स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। विश्वविद्यालयों की पहचान केवल भवनों एवं परिसरों से नहीं, बल्कि उनके शैक्षणिक वातावरण, अनुशासन, शोध, नवाचार एवं उपलब्धियों से होती है। उन्होंने कहा कि जिस दिन झारखण्ड के विद्यार्थी यह महसूस करेंगे कि उसे बेहतर शिक्षा के लिए राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है, उस दिन हम कह सकेंगे कि हमारा प्रयास वास्तव में सफल हुआ है।
श्री गंगवार ने कहा कि राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति पारदर्शी प्रक्रिया के तहत सर्च कमिटी के माध्यम से की गई है और उनसे बहुत अपेक्षाएँ हैं। उन्होंने कहा कि कुलपति केवल प्रशासक नहीं, बल्कि एकेडमिक लीडर के रूप में कार्य करें। उन्होंने डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा स्वयं कक्षा लेने के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों से विश्वविद्यालयों में अनुशासन एवं विद्यार्थियों का विश्वास दोनों मजबूत होते हैं।
श्री गंगवार ने कहा कि उच्च शिक्षा को नई गति एवं दिशा देने के उद्देश्य से 'झारखण्ड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026' लागू किया गया है, जिसका उद्देश्य संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं शैक्षणिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करना है। उन्होंने सभी कुलपतियों एवं विश्वविद्यालय पदाधिकारियों से नए अधिनियम का गंभीरता से अध्ययन करने का आग्रह किया।
श्री गंगवार ने विश्वविद्यालयों में एकेडमिक कैलेंडर का दृढ़ता से पालन सुनिश्चित करने पर बल देते हुए कहा कि नियमित कक्षाएँ संचालित हों, पाठ्यक्रम समय पर पूर्ण हो तथा परीक्षाएँ एवं परिणाम निर्धारित समयसीमा में प्रकाशित किए जाएँ। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों का भविष्य किसी भी प्रकार की प्रशासनिक शिथिलता का शिकार नहीं होना चाहिए।
श्री गंगवार ने शोध, नवाचार, कौशल आधारित शिक्षा, स्टार्टअप और इंडस्ट्री लिंकेज को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने के केंद्र न बनें, बल्कि नवाचार एवं कौशल विकास के सशक्त केंद्र के रूप में विकसित हों। उन्होंने वित्तीय अनुशासन एवं पारदर्शिता को भी अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि सार्वजनिक धन का उपयोग पूर्ण जवाबदेही एवं ईमानदारी के साथ किया जाना चाहिए।
श्री गंगवार ने ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि सभी कुलपति, विश्वविद्यालय पदाधिकारी एवं शिक्षाविद संकल्प के साथ मिलकर कार्य करें, तो झारखण्ड की शैक्षणिक छवि निश्चित रूप से बदलेगी और आने वाले समय में राज्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श एवं अनुकरणीय पहचान स्थापित करेगा।
इस अवसर पर राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव डॉ० नितिन कुलकर्णी ने कहा कि उच्च शिक्षा का संपूर्ण नेतृत्व इस सभागार में उपस्थित है और अब केवल चर्चा नहीं, बल्कि परिणामोन्मुख कार्य की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि नेतृत्व की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती, लेकिन स्पष्ट दिशा एवं प्रभावी कार्य-ढाँचा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सचिव द्वारा जाकर कॉलेजों का संचालन संभव नहीं है, बल्कि कुलपति, डीन एवं शिक्षकों को मिलकर नेतृत्वकारी भूमिका निभानी होगी।
अपर डॉ० कुलकर्णी ने कहा कि आज केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिणाम-आधारित शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह आत्मचिंतन का विषय है कि हमारे विश्वविद्यालय समाज से वास्तव में जुड़े हैं तथा क्या शोध कार्य स्थानीय समस्याओं के समाधान की दिशा में केंद्रित हैं?डॉ० कुलकर्णी ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल भवन मात्र नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाले केंद्र होने चाहिए। उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आज के समय में शिक्षक को भी तकनीक के अनुरूप स्वयं को निरंतर अपडेट करना होगा। आज एआई एवं अन्य आधुनिक तकनीक के युग में यदि कोई शिक्षक 45 से 60 मिनट तक विद्यार्थियों को विषय से जोड़े रखते हैं, तो यह सराहनीय है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों में तार्किक एवं विश्लेषणात्मक सोच विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
डॉ० कुलकर्णी ने विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक एवं वित्तीय तंत्र को अधिक सक्षम एवं पारदर्शी बनाने पर बल देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान न बनें, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले केंद्र के रूप में विकसित हों। उन्होंने कहा कि प्रत्येक शिक्षाविद् को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे अपने बच्चों को भी उसी विश्वविद्यालय में पढ़ाना पसंद करेंगे। यही किसी संस्थान की वास्तविक गुणवत्ता की कसौटी है।
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