काश! अंकल सैम ने कामायनी पढ़ी होती
नई दिल्ली, मई 23 -- सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार आइए भारत की ज्ञान परंपराओं को खोजें, ज्ञान व्यवस्थाओं को तलाशें, उन्हें पुनरुज्जीवित करें और एक बार फिर दुनिया को ताल ठोककर बता दें कि भारत किसी के ज्ञान का गुलाम नहीं, उसके पास अपना ज्ञान भंडार है। सच कहूं, जब-जब ऐसे विचार आते हैं, मेरे जैसे हिंदी साहित्य के परचूनिए की भारत-भक्ति भड़क उठती है। अंग्रेजी ज्ञानियों के आगे हमेशा दबा-पिचका रहने वाला सीना कुछ फूल सा जाता है, झुकी गरदन तन जाती है और आखों में एक नई दीप्ति भर जाती है और तब मुझे इन काव्य पंक्तियों के मानी समझ में आते हैं- जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं/ वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं!! स्वदेश के इस ज्ञान भाव की बहुत से लोग खिल्ली उड़ाते हैं। कुछ कहते हैं कि भारत का ज्ञान खोजना ठीक है, लेकिन इ...
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